पितृसत्ता
क्या समाज को पता है कि वह पितृसत्तात्मक है?
समाज कभी एक दिन में नहीं बनता। वह सदियों की आदतों, डर, विश्वासों और सुविधाओं से गढ़ा जाता है। इसलिए कई बार समाज अपनी ही बनाई हुई दीवारों को प्रकृति समझ बैठता है।
पितृसत्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है। वह एक विचार है—इतना पुराना कि उसे पहचानना कठिन हो गया है। वह कानूनों से पहले भाषा में जन्म लेती है, परंपराओं में पलती है और फिर इतनी सामान्य हो जाती है कि प्रश्न पूछना ही असभ्यता माना जाने लगता है।
सबसे गहरी कैद वह नहीं होती जिसकी सलाखें दिखाई दें। सबसे गहरी कैद वह होती है, जिसमें कैदी भी स्वयं को स्वतंत्र समझता है। शायद पितृसत्ता भी वैसी ही है। वह केवल स्त्रियों को नहीं बाँधती; वह पुरुषों से भी उनकी सहजता, उनकी कोमलता और उनके आँसू छीन लेती है। वह दोनों को भूमिकाएँ देती है, और फिर उन भूमिकाओं को ही पहचान का दूसरा नाम बना देती है।
समाज को अक्सर अपनी व्यवस्था से प्रेम नहीं होता, उसे उसकी आदत हो जाती है। और आदतें, सत्य का सबसे शांत मुखौटा होती हैं।
हर युग अपने भ्रम को "संस्कार" कहता है और अगले युग के प्रश्नों को "विद्रोह"। लेकिन इतिहास ने बार-बार साबित किया है कि हर परिवर्तन की शुरुआत किसी एक असुविधाजनक प्रश्न से हुई थी।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि समाज पितृसत्तात्मक है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या समाज स्वयं को देखने का साहस रखता है? क्या वह उस आईने के सामने ठहर सकता है जिसमें चेहरा नहीं, चेतना दिखाई देती है?
क्योंकि सभ्यताएँ तब नहीं बदलतीं जब उनके कानून बदलते हैं। वे तब बदलती हैं जब उनकी चेतना बदलती है।
और शायद किसी भी लेखक का सबसे बड़ा दायित्व उत्तर देना नहीं, बल्कि ऐसे प्रश्न लिख जाना है जिनसे बच पाना असंभव हो जाए।
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